मांगलिक दशा


सिर्फ मंगल ग्रह के कारण मांगलिक दोष नहीं उत्पन्न होते हैं, बल्कि इस दोष में शनि, सूर्य, राहु एवं केतु का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है। मंगली दोष का विचार सिर्फ लग्न से करने पर परिणाम हमेशा सही नहीं आते और यह विचार करने का उचित तरीका भी नहीं है। इस योग का विचार लग्न के साथ साथ चंद्र एवं शुक्र से भी करना जरूरी है। लग्न से बनने वाले दोष कम प्रभावी होते हैं, चंद्रमा से कुछ ज्यादा और शुक्र से पूर्ण प्रभावी होते हैं, इसी प्रकार शास्त्रों में पाप ग्रहों में मंगल, शनि, सूर्य, राहु एवं केतु उत्तरोत्तर कम पापी माने गए हैं। इसलिए यह कहा जा सकता है कि मंगल, शनि, सूर्य राहु एवं केतु इन ग्रहों से बनने वाले योगों का प्रभाव उत्तरोत्तर कम होता जाता है। गहन अध्ययन एवं अनुसंधान के बाद यह पाया गया कि सप्तम, लग्न या चतुर्थ स्थानों पर उपर्युक्त ग्रहों से विशेषकर मंगल एवं शनि से बनने वाला योग दांपत्‍य जीवन को प्रभावित करता है और शेष स्थिति में बनने वाले योग का बहुत कम या तात्कालिक प्रभाव पड़ता है। मांगलिक दोष का विचार कुंडली में स्थित ग्रहों और राशि की स्थितियों के आधार पर भी करके निर्णय लेना चाहिए।